नई शुरुआत

या साल एक नई शुरुआत है। नए विचारों की शुरुआत, नए संकल्पों का समय, जीवन में कुछ नया कर दिखाने के लिए आगे बढ़ने का समय। नए साल का स्वागत नई ऊर्जा के साथ करें। अपने अंदर बदलाव लाने के लिए कमर कस लें। आत्मनिरीक्षण करें, अपनी कमियों की पहचान करें और उनके समाधान की राह खोजें। समाधान आपके अंदर ही मौजूद है। सकारात्मक ऊर्जा के साथ आगे बढ़ें। नए विचारों को महत्व दें और उन्हें आत्मसात करने की चेष्टा करें। पिछले साल भी आपने कुछ न कुछ बेहतर किया होगा-कुछ ऐसा जिसने आपको आत्मसंतोष दिया होगा। यही आत्मसंतोष आपके लिए आगे बढ़ने की प्रेरणा होनी चाहिए। नाकामी से हमें घबराना नहीं है। प्रत्येक असफलता हमें जीवन में कुछ न कुछ सिखाती है। कई लोग असाधारण अवसर की बाट देखते रहते हैं। अवसर छोटे-बड़े नहीं होते। अगर हम चाहें तो छोटे से छोटे अवसर का भी इस्तेमाल कर किसी बड़ी कामयाबी का आधार तैयार कर सकते हैं। यह वही कर सकता है जिसे अपने आप पर भरोसा है और जो अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित हो। अवसर भी उन्हीं की सहायता करता है जो अपनी सहायता खुद करना जानते हैं। नए वर्ष के अवसर पर अक्सर लोग बड़े-बड़े संकल्प ले लेते हैं और फिर उन्हें पूरा नहीं कर पाते। इसलिए यह आवश्यक है कि हम अपने लिए छोटे लक्ष्य तय करें।


याद रखिये कोई संकल्प पूरा होने पर जो संतोष होता है उसकी कोई बराबरी नहीं है। संकल्प पूरा करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति आवश्यक होती है। अक्सर हम संकल्प तो ले लेते हैं, लेकिन उसे पूरा करने के लिए जिस दृढ़ता की आवश्यकता होती है उसका परिचय नहीं दे पाते। नए साल में सदाचार का संकल्प अवश्य लें। सदाचार से कल्याण का मार्ग खुलता है। जिसने सदाचार को अपने जीवन में शामिल कर लिया है उसकी कीर्ति बढ़नी तय है। अपने अंतरमन में झांकें और यह देखें कि ऐसी कौन सी बुराइयां हैं जो आपकी छवि खराब करने वाली हैं। इन बुराइयों से छुटकारा पाने के लिए हर जतन कीजिए। यकीन मानिए अगर आपमें सुधार की इच्छा है तो आप अपनी कमियों को अवश्य दूर कर लेंगे। नए साल में शुरुआत करें एक नए जीवन की। शुभकामनाएं।
जल ही जीवन है,

यह तो हम जानते ही हैं। अलग-अलग तरह से इसके सेवन से तमाम तरह के लाभ भी मिलते हैं। जल योग न केवल उच्च रक्तचाप, कब्ज, गैस आदि बीमारियों से मुक्ति दिलाता है, बल्कि यह हमारी हड्डियों, मस्तिष्क और हृदय को मजबूत बनाने में भी खास भूमिका निभाता है।
हमारे योगियों ने ‘जल योग’ पर बहुत विस्तार से बताया। यह भी कहा कि हरेक व्यक्ति को रात में ‘तांबे के बर्तन’ में जल रखकर प्रात:काल बासी मुंह से ‘उत्कट’ आसन में बैठकर उसका सेवन करना चाहिए। इस जल से हमारे शरीर में वात-पित्त और कफ का नाश होता है।
पहले लोग तांबे के बर्तनों में भोजन पकाते या फिर परोसते थे। तांबे के गिलास में ही जल पीते थे। लेकिन आज तांबे के बर्तन के महत्व को गौण कर दिया गया है। लेकिन इसके अनेक फायदों से हम इनकार नहीं कर सकते। यही कारण है कि आज भी बहुत से लोग तांबे के बरतन में रात में पानी रखकर सुबह उसका सेवन करते हैं। तांबे के बर्तन में रखे जल के लाभ के बारे में हम आपको ‘जल योग’ के माध्यम से बताते हैं ताकि आप भी इसका भरपूर लाभ उठा सकें।

जल योग के लिए 
सामग्री: तांबे का एक लोटा या फिर जग और तांबे के एक गिलास की जरूरत पड़ेगी। रोज रात को सोने से पहले लोटे या जग में पानी भरकर उसे ढ़ककर किसी लकड़ी के ऊपर या लकड़ी की मेज पर रख दें। प्रात:काल उठकर बिना ब्रश किए इस जल को ‘उत्कट आसन’ में  बैठकर पीएं। शुरू-शुरू में दो गिलास तक जल पीएं। उसके बाद धीरे-धीरे 5 गिलास तक पीने का अभ्यास करें। जल का सेवन करने के बाद शौच आदि के लिए जाएं। इस अभ्यास को आजीवन करें। इससे आपके शरीर में केवल पानी ही नहीं बल्कि कॉपर भी प्राकृतिक रूप से जाएगा। द वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के अनुसार प्रत्येक भारतीय को रोज 2 मिग्रा कॉपर लेना जाहिए जो इस योग की सहायता से प्राप्त हो सकता है।

स्वास्थ्य पर कॉपर का प्रभाव
जब तक हम तांबे के लोटे में रखा हुआ जल रोज प्रात:काल में पीते हैं, हमारे शरीर को कॉपर की जरूरी मात्र मिलती रहती है। कॉपर की यह जरूरी मात्र हमारी हड्डियों, मस्तिष्क, हृदय और शरीर के कई अन्य अंगों को मजबूती प्रदान करने में अहम भूमिका निभाती है। इतना ही नहीं, जल योग द्वारा हम उच्च रक्तचाप, कब्ज, गैस, अजीर्ण और हृदय रोग जैसे रोगों से भी अपना बचाव कर पाते हैं।

कॉपर के दूसरे स्त्रोत
यदि हम अपने भोजन में हरी सब्जी, अनाज, सेम, आलू, गहरे हरे पत्तों वाली सब्जियां, काली मिर्च, बादाम, दालें, दही शामिल करें तो हमारे शरीर को तांबे की जरूरत पूरी हो जाती है। अपने खाने पर थोड़ा ध्यान रखने पर हमें यह आसानी से मिल जाता है।

सावधानियां
किसी भी चीज की अति तो हानिकारक होती ही है। इसी प्रकार तांबे की भी निश्चित मात्र तय की गई है। यदि आप 2 मिग्रा से ज्यादा तांबा लेते हैं तो आपको लीवर, मस्तिष्क और किडनी संबंधित समस्या हो सकती है। इसलिए इस योग के लिए भी किसी अच्छे योग गुरु से सलाह ले लें।

सिद्धिदायक हैं गुप्त नवरात्र



मानव के समस्त रोग-दोष व कष्टों के निवारण के लिए गु# नवरात्र से बढ़कर कोई साधना काल नहीं हैं। श्री, वर्चस्व, आयु, आरोग्य और धन प्राप्ति के साथ ही शत्रु संहार के लिए गु# नवरात्र में अनेक प्रकार के अनुष्ठान व व्रत-उपवास के विधान शास्त्रों में मिलते हैं।

इन अनुष्ठानों के प्रभाव से मानव को सहज ही सुख व अक्षय ऎश्वर्य की प्राप्ति होती है। "दुर्गावरिवस्या" नामक ग्रंथ में स्पष्ट लिखा है कि साल में दो बार आने वाले गु# नवरात्रों में भी माघ में पड़ने वाले गु# नवरात्र मानव को न केवल आध्यात्मिक बल ही प्रदान करते हैं बल्कि इन दिनों में संयम-नियम व श्रद्धा के साथ माता दुर्गा की उपासना करने वाले व्यक्ति को अनेक सुख व साम्राज्य भी प्राप्त होते हैं। "शिवसंहिता" के अनुसार ये नवरात्र भगवान शंकर और आदिशक्ति मां पार्वती की उपासना के लिए भी श्रेष्ठ है। 

विवाह बाधा करें दूर
कुमारी कन्याओं को भी अच्छे वर की प्राप्ति के लिए इन नौ दिनों माता कात्यायनी की पूजा-उपासना करनी चाहिए। "दुर्गास्तवनम्" जैसे प्रामाणिक प्राचीन ग्रंथों में लिखा है कि इस मंत्र का 108 बार जप करने से कुमारी कन्या का विवाह शीघ्र ही योग्य वर से संपन्न हो जाता है-

कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरू ते नम:।।

इसी तरह जिन पुरूषों के विवाह में विलंब हो रहा हो उन्हें भी लाल पुष्पों की माला देवी को चढ़ाकर इस मंत्र के 108 बार जप पूरे नौ दिन तक करने चाहिए-

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।

शिशिर ऋतु के पवित्र माघ मास में शुभ्र चांदनी को फैलाते शुक्ल पक्ष में मंदिर-मठों और सिद्ध देवी स्थानों में "दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोùस्तु ते।" की शास्त्रीय ध्वनि सुनाई देने लगती है। ये मंत्र वे हैं, जिन्हें सहस्राब्दियों से हमारी संस्कृति में भगवती से वर प्राप्ति के लिए जपा जाता है। नवरात्र यानी तांत्रिक-यांत्रिक-मांत्रिक साधना का सर्वोत्तम काल और पूरे नौ दिनों तक कन्यारूपिणी शक्ति-कुमारी माता दुर्गा का पूजन-अर्चन-वंदन और पाठ। हमारे यहां नवरात्र वर्ष में चार बार आते हैं। दो बार प्रत्यक्ष व दो बार गु# रूप में। 

देवी की महिमा अपार
शास्त्र कहते हैं कि आदिशक्ति का अवतरण सृष्टि के आरंभ में हुआ था। कभी सागर की पुत्री सिंधुजा-लक्ष्मी तो कभी पर्वतराज हिमालय की कन्या अपर्णा-पार्वती। तेज, द्युति, दीप्ति, ज्योति, कांति, प्रभा और चेतना और जीवन शक्ति संसार में जहां कहीं भी दिखाई देती है, वहां देवी का ही दर्शन होता है। ऋषियों की विश्व-दृष्टि तो सर्वत्र विश्वरूपा देवी को ही देखती है, इसलिए माता दुर्गा ही महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में प्रकट होती है। देवीभागवत में लिखा है कि देवी ही ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश का रूप धर संसार का पालन और संहार करती हैं। जगन्माता दुर्गा सुकृती मनुष्यों के घर संपत्ति, पापियों के घर में अलक्ष्मी, विद्वानों-वैष्णवों के ह्वदय में बुद्धि व विद्या, सज्जनों में श्रद्धा व भक्ति तथा कुलीन महिलाओं में लज्जा एवं मर्यादा के रूप में निवास करती है। मार्कण्डेयपुराण कहता है कि "हे देवि! तुम सारे वेद-शास्त्रों का सार हो। भगवान् विष्णु के ह्वदय में निवास करने वाली मां लक्ष्मी-शशिशेखर भगवान् शंकर की महिमा बढ़ाने वाली मां तुम ही हो।"

नवरात्र में सरस्वती पूजा महोत्सव
माघी नवरात्र में पंचमी तिथि सर्वप्रमुख मानी जाती है। इसे श्रीपंचमी, वसंत पंचमी और सरस्वती महोत्सव के नाम से कहा जाता है। प्राचीन काल से आज तक इस दिन माता सरस्वती का पूजन-अर्चन किया जाता है। यह त्रिशक्ति में एक माता शारदा के आराधना के लिए विशिष्ट दिवस के रूप में शास्त्रों में वर्णित है। कई प्रामाणिक विद्वानों का यह भी मानना है कि जो छात्र पढ़ने में कमजोर हो या जिनकी पढ़ने में रूचि नहीं हो, ऎसे विद्यार्थियों को अनिवार्य रूप से मां सरस्वती का पूजन करना चाहिए। देववाणी संस्कृत भाषा में निबद्ध शास्त्रीय ग्रंथों का दान संकल्पपूर्वक विद्वान ब्राह्मणों को देना चाहिए। 

महानवमी को पूर्णाहुति
गु# नवरात्र में संपूर्ण फल की प्राप्ति के लिए अष्टमी और नवमी को आवश्यक रूप से देवी के पूजन का विधान शास्त्रों में वर्णित है। माता के संमुख "जोत दर्शन" एवं कन्या भोजन करवाना चाहिए। 

नारीरूप में पूजित देवी 
कूर्मपुराण में धरती पर देवी के बिंब के रूप में स्त्री का पूरा जीवन नवदुर्गा की मूर्ति के रूप से बताया है। जन्म ग्रहण करती हुई कन्या "शैलपुत्री", कौमार्य अवस्था तक "ब्रह्मचारिणी" व विवाह से पूर्व तक चंद्रमा के समान निर्मल होने से "चंद्रघंटा" कहलाती है। नए जीव को जन्म देने के लिए गर्भधारण करने से "कूष्मांडा" व संतान को जन्म देने के बाद वही स्त्री "स्कंदमाता" होती है। संयम व साधना को धारण करने वाली स्त्री "कात्यायनी" व पतिव्रता होने के कारण पति की अकाल मृत्यु को भी जीत लेने से "कालरात्रि" कहलाती है। संसार का उपकार करने से "महागौरी" व धरती को छोड़कर स्वर्ग प्रयाण करने से पहले संसार को सिद्धि का आशीर्वाद देने वाली "सिद्धिदात्री" मानी जाती है।

नवरात्र में घट स्थापना
शा स्त्रीय मान्यता के अनुसार स्वच्छ दीवार पर सिंदूर से देवी की मुख-आकृति बना ली जाती है। सर्वशुद्धा माता दुर्गा की जो तस्वीर मिल जाए, वही चौकी पर स्थापित कर दी जाती है, परंतु देवी की असली प्रतिमा तो "घट" है। घट पर घी-सिंदूर से कन्या चिह्न और स्वस्तिक बनाकर उसमें देवी का आह्वान किया जाता है। देवी के दायीं ओर जौ व सामने हवनकुंड। नौ दिनों तक नित्य देवी का आह्वान फिर स्नान, वस्त्र व गंध आदि से षोडशोपचार पूजन। नैवेद्य में पतासे और नारियल तथा खीर। पूजन और हवन के बाद "दुर्गासप्तशती" का पाठ करना श्रेष्ठ है। साथ ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त करने के लिए नवदुर्गा के प्रत्येक रूप की प्रतिदिन पूजा-स्तुति करनी चाहिए।

 
 

 फेफड़ों में संक्रमण से भी होता है सीने में दर्द

वाराणसी (एसएनबी)।
फेफड़ों में संक्रमण के चलते भी सीने में दाहिनी ओर तेज दर्द हो सकता है। सीने में दर्द की शिकायत का यह मतलब नहीं कि व्यकित को दिल का दौरा पड़ गया इसके और भी कारण हो सकते हैं। गंदगी के चलते अमेबिक लीवर ऐप्सिस जैसी जानलेवा बीमारी में सीने में दर्द की शिकायत होती है। कूड़े की ढ़ेर पर बसे मुहल्लों में रहने वाले लोग दूषित जल व संक्रमित भोजन के चलते इस बीमारी के आसान शिकार होते हैं। यह बीमारी वैक्टेरिया से उपजे डायरिया व डिसेन्ट्री तक ही सीमित नहीं है बल्कि इससे जान को भी खतरा है। अमेबिक लीवर ऐप्सिस की समस्या खासकर टीबी रोग से ग्रसित मरीजों में देखी जाती है लेकिन प्रदूषण के चलते यह सामान्य लोगों में भी दिख रही है। टीबी की वजह से फेफड़े में संक्रमण सामान्य बात है लेकिन दूषित जल व भोजन की वजह से फेफड़े की झिल्ली में एम्पाइमा चौकाने वाली बात है यह जानलेवा बीमारी मानी जाती है। इस प्रकार होता है संक्रमण : दूषित जल व भोजन पेट के रास्ते अमाशय, छोटी आंत से होते हुए बड़ी आत तक पहुंच कर बीमारी फैलाता है। कुछ वैक्टीरिया मल के रास्ते निकल जाते है लेकिन यहीं से कुछ रक्त के सहारे लीवर में पहुंच कर संक्रमण फैलाते हैं। अमेबिक हेपेटाइटिश यानी लीवर में सूजन होने लगता है और मरीज का पेट फूल जाता है। लीवर में पल रहा संक्रमण का गोला फेफड़ों की झिल्ली में पहुंचकर फट जाता है जिसके चलते मरीज की मौत भी हो सकती है। इस रोग का उपचार बिना आपरेशन के महज दवाईयों से किया जाता है। जांच से चलता है पता : रोग का निर्धारण एक्स-रे व अल्ट्रासोनोग्राफी की रिपोर्ट से की जाती है। पूर्व मे इस तरह के मरीजों की जान बचानी मुश्किल थी लेकिन इलाज की आधुनिकतम तकनीक के बल पर समय रहते उचार करने से इस तरह के मरीजों की जान बचायी जा सकती है। दूषित जल व संक्रमित भोजन से होती यह बीमारी


देश की शान है सेंट मेरीज महागिरजा
अमन/एसएनबी वाराणसी।



सेंट मेरीज महागिरजा की गिनती दुनिया के खूबसूरत गिरजाघरों में
होती है। फादर चन्द्रकांत बताते हैं कि सेंट मेरीज की संगे-बुनियाद
एक अस्तबल में 1840 में अंग्रेजी हुकूमत के दौरान रखी गयी थी,
मगर इसका लिखित इतिहास 1920 से मिलता है। वाराणसी
धर्मप्रांत द्वारा संचालित इस महागिरजा की सुंदरता और भव्यता
1970 में बिशप बने पैट्रिक डिसूजा ने अपने कार्यकाल में दिया था।
वो 8 अगस्त 1970 को बिशप बने थे। उससे पहले बनारस आगरा
धर्मप्रांत द्वारा संचालित होता था। पैट्रिक डिसूजा के प्रयास से ही
यह इसे महागिरजा का दर्जा मिला। इस र्चच को भव्यता प्रदान
करने के लिए 1989 में उन्होंने पुननिर्माण शुरू कराया और
परिणाम स्वरुप कुशल वास्तुविद् की डिजाइन पर यह कैथड्रल
1993 में जब तैयार हुआ तो ईसाई ही नहीं बल्कि सभी मजहब के
लोगों ने इसकी सराहना की। इसकी खूबसूरती कैंटोमेंट इलाके से
गुजरने वाले तमाम देशी-विदेशी सैलानियों को आकर्षित करती है।
फादर राजा कहते हैं कि महागिरजा वास्तुकला और खूबसूरती के
लिहाज़ से देश की शान है। जो दुनिया भर में अपनी अपनी
बेशकिमती वास्तुकला के लिए जानी जाती है। इसके अंडर ग्राउण्ड
में बाइबिल प्रदर्शनी की विद्या रची है। इस महागिरजा की बाहरी
दीवारों पर प्रभु ईसा मसीह के जहां संदेश लिखे हैं वही भीतरी
दीवार पर गीता का श्लोक लिखा है। गिरजा के पीछे माता मरियम
की प्रतिमा है। क्रिसमस पर यहां तीन दिन तक मेला लगता है।
हाल में ही बिशप डा. राफी मंजली के इलाहाबाद तबादले के चलते
यहां बिशप का पद रिक्त है, प्रशासक फादर यूजीन के हाथों में है।

2014 जहां शुरू वहीं खतम
कुमार शशि/एसएनबी
 वाराणसी। नव वर्ष 2014 का पहला और आखिरी दिन बुधवार होगा। यह संयोग 2003 के बाद एकबार फिर आया है। यह साल ढेरों खुशियां और थोड़ा गम भी देगा। इस खगोलीय अनूठे संयोग के बारे पंचांग भी अपनी बात कहने में पीछे नहीं है। पंचांग की मानें तो अंग्रेजी नव वर्ष का प्रथम और अंतिम दिन का बुधवार होना अति शुभ है। हालांकि नये साल का प्रवेश चतुग्र्रही योग में होगा, जो अमंगलकारी फल देगा। बावजूद इसके यह वर्ष सभी के लिए अच्छा बीतेगा। लीप ईयर अपवाद : लीप ईयर यानी चार से भाज्य साल को छोड़कर हर साल का पहला और आखिरी दिन एक ही होगा। यही नहीं ऐसे किसी भी साल में जुलाई (एक अतिरिक्त दिन को छोड़कर) और अप्रैल का कैलेंडर एक ही जैसा होता है। इसी तरह का नाता सितम्बर-दिसम्बर और मार्च-नवम्बर में भी होता है। खगोल विज्ञान का खेल : पृथ्वी, सूर्य के चारों ओर एक चक्कर लगाने में 365 दिन यानी एक साल का समय लगाती है। साथ ही एक सप्ताह में सात दिन होते हैं। इस तरह पूरे साल में 52 सप्ताह हुए और एक दिन अतिरिक्त बचता है। अब अगर यह मान लिया जाए कि किसी साल की शुरुआत रविवार से हो रही है तो जिस दिन 52 सप्ताह समाप्त होंगे, वह शनिवार होगा। इसके एक दिन बाद रविवार पड़ेगा, जो साल का आखिरी दिन होगा। जबकि लीप ईयर में 366 दिन होने के कारण 52 सप्ताह के बाद दो दिन शेष बचता है। इसलिए लीप ईयर की शुरुआत सप्ताह के जिस दिन से होती है, उसके अगले दिन पर साल खत्म होता है। एक राशि और चार ग्रह : एक राशि में चार ग्रह तीन दिन तक राज करेंगे। इस बाबत आचार्य ऋषि द्विवेदी ने बताया कि शास्त्र सम्मत है कि चार या पांच ग्रहों का एक राशि में होना अशुभ है। इससे जल या खंड पल्रय, मार-काट और जन व धन हानि की संभावना बनी रहेगी। इसबार नये साल की शुरुआत चतुग्र्रही योग में हो रही है जिसका प्रभाव मकर संक्रांति तक बना रहेगा। वर्तमान में धनु राशि में सूर्य, बुध और शुक्र विराजमान हैं 31 दिसम्बर को अपराह्न 01:02 बजे चंद्रमा भी प्रवेश कर जायेगा। इनके प्रवेश के साथ ही चतुग्र्रही योग बनेगा जो दो जनवरी को अपराह्न 03:26 बजे तक रहेगा। बुधवार और अमावस्या : साल का पहला और आखिरी दिन बुधवार होना अतिशुभ है। चूंकि ये गणोशजी का प्रिय दिन है, इसलिए इसदिन उनके दर्शन करने से पूरे साल मंगल ही मंगल होगा। इसके अलावा साल का पहला दिन अमावस्या से युक्त रहेगा। स्नान-दान और श्राद्ध की पौष कृष्ण अमावस्या तिथि 31 दिसम्बर को रात 07:25 बजे लगेगी जो 1 जनवरी को सायं 05:09 बजे तक रहेगी। चतु ग्र्रही योगमें होगा नये साल का श्रीगणोश
साल के पहले दिन स्नान-दान की अमावस्या
बढ़ रहा म्यूजिकल बाथ का चलन
मंगलवार, 17 दिसंबर 2013 Varanasi Updated @ 5:44 AM IST
वाराणसी। गमछा पहन कर गंगा में छलांग लगाने, घाट पर मसाज कराने, बालू पर लेट कर धूप सेंकने की अपनी अलग मौज है लेकिन बदलते दौर के साथ अब इन सबके लिए न पहले सी सहूलियतें हैं न ही लोगों के पास उतना समय है। अब आधुनिक उपकरणाें के जरिये कुछ ऐसे ही सुख और सुकून बाथरूम में ही जुटाने की ललक बढ़ी है। नए जमाने में रहन-सहन का तरीका बदल रहा तो बाथरूम की संस्कृति में भी तेजी से बदलाव हो रहा है। वाराणसी ही नहीं बल्कि पूर्वांचल भर में में म्यूजिकल बाथ जैसी आधुनिक सुविधाओं से युक्त बाथरूम की मांग तेजी से बढ़ रही है।
पूर्वांचल के गाजीपुर, मऊ, आजमगढ़ और वाराणसी जिलों के अमीरों में सुबह सुकून भरे स्नान की ललक बढ़ी है। बाथरूम में लोग तरह-तरह के इलेक्ट्रानिक गैजेट्स लगवा रहे हैं। संगीतमय फव्वारा, आरामदायक बाथ टब और मसाज आदि की सुविधाएं जुटाई जा रही हैं। म्यूजिकल बाथ उपकरण की कीमत 60 हजार से लेकर 10 लाख रुपये तक है। दुकानदार बताते हैं कि 60 हजार रुपये में एफएम रेडियो युक्त शॉवर पैनल लगाए जा सकते हैं। म्यूजिकल बाथ टब, म्यूजिकल फव्वारा, शॉवर की कीमतें इससे भी ज्यादा हैं। शौकीनों के लिए कीमतें कोई मायने नहीं रखती हैं।
 
हाउस ऑफ जानसन शोरूम के रामेश्वर सिंह ने बताया कि म्यूजिक की तीव्रता के साथ ही फव्वारे से निकलने वाले पानी की धार भी तेज होती जाती है। खासतौर से ऐसी सुविधाओं से युक्त बाथरूम बच्चों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं। इसके अलावा कुछ लोग बाथरूम में ग्लास इनक्लोजर भी लगवा रहे हैं। इस तरह के बाथरूम में मसाज तक की व्यवस्था रहती है। वैसे उनका कहना है कि अधिकतर लोग एफएम रेडियो शॉवर पैनल की डिमांड करते हैं। उधर, बिल्डरोें का कहना है कि सर्व सुविधायुक्त फ्लैट्स की खरीदारी में भी लोग रुचि दिखाने लगे हैं। शहर में एक करोड़ रुपये से ज्यादा कीमत वाले फ्लैट्स भी बिक रहे हैं तो खरीदार की यह भी उम्मीद होती है कि उसका बाथरूम बेहतर हो।
इनसेट
कैसे काम करता है एफएम रेडियो
शावर पैनल में एफएम रेडियो लगा होता है। पूरा पैनल रिमोट कंट्रोल से चलता है। जैसे जैसे म्यूजिक की तीव्रता बढ़ने के साथ पानी की धार भी तेज हो जाती है। वहीं बाथ टब में गाने के साथ ही पानी की धार इस तरह निकलती है, जैसे लगता है कि कोई शरीर का मसाज कर रहा है।

 साभार अमरउजाला 
राधे-राधे के दम पर कद को दी मात 

वृंदावन। कद को देख हर मुस्कराहट सुकून नहीं बल्कि जी जलाती थी। कोई छोटू कहता तो कोई बौना और कोई कुछ..। हिम्मत दिखाई किस्मत चमकी और साढ़े तीन फुट के राजाराम की राधे-राधे हो गई। अपने देश में नहीं बल्कि सात समंदर पार साढ़े तीन फुट के राजाराम और उनसे एक इंच कम उनकी पत्नी माया विदेशों में रास लीला करते हैं।
वहां उनके कद को हिकारत से नहीं बल्कि कलाकार के रूप में सम्मान से देखा जाता है।
विश्वविख्यात रासाचार्य पद्मश्री स्वामी हरिगोविंद की रास मंडली में शामिल राजाराम और उनकी माया की अपनी कहानी है। मूल रूप से मथुरा रिफाइनरी के पास बसे गांव गिजनुआं के रहने वाले राजाराम शर्मा माता-पिता के अनूठे प्रेम में पले। राजाराम बताते हैं कि कद छोटा होने के कारण चौदह-पंद्रह साल की उम्र में उन्हें उपेक्षा का शिकार होना पड़ा। आखिरकार पिता सियाराम और मां भागवती ने पढ़ाई छुड़वा दी। जैसे-तैसे हाईस्कूल पास किया। परीक्षा में नंबर अच्छे मिले, मगर नौकरी की राह में कद रोड़ा बन गया।
राजाराम ने बताया कि परेशानी के दौर में एक दिन मन में भाव जागा कि जिसने उसे छोटा कद दिया वही कल्याण भी करेगा। सो मथुरा पहुंच गया। वहां रोजाना प्रात: यमुना स्नान कर द्वारिकाधीश की सेवा शुरू कर दी। मंदिर के सेवायत श्रद्धा भाव देखकर खाने को देने लगे। दर्शन के बाद श्रद्धालु कुछ पैसे भी दे देते, जिन्हें ठाकुर का आशीर्वाद समझकर रख लेता। बारह साल के लंबे अंतराल के बाद जैसा कि उसने बताया उसके पिता और माता उसे मथुरा आकर ले गये, घर जाकर बताया कि आगरा से उसके लिये रिश्ता आया था, लड़की भी उसी के कद के बराबर है।
परिवार बढ़ा तो काम की जरुरत हुई। वृंदावन के रासाचार्य पद्मश्री स्वामी हरगोविंद महाराज की शरण में पत्‍‌नी के साथ पहुंचा तो वहां आशीर्वाद मिला। रहने के ठिकाने के साथ-साथ रासलीला में शामिल कर दिया। इसके बाद जिंदगी ही बदल गई। वह सिंगापुर, अमेरिका, रूस, हांगकांग, बांग्लादेश नेपाल समेत कई देशों में रासलीला में राधे-राधे कर चुका है। रासलीला में वह अच्छे कमेडियन के रूप में भी देशभर और विदेशों में विख्यात है।
एमए पास है माया-
तीन फुट पांच इंच की माया शर्मा भी कम नहीं है। जहां राजाराम हाईस्कूल पास है तो माया ने एमए तक शिक्षा प्राप्त की है। कहतीं है सब कुछ कन्हैया का है। हम दोनों साथ-साथ काम करते हैं और साथ मिलकर कन्हैया की सेवा करते हैं।

 साभार दैनिकजागरण
 
वक्त के साथ बदलती है मां की इमेज

 बच्चा मां के लिए सबसे अहम होता है और मां भी बच्चे के लिए हमेशा खास बनी रहती है। लेकिन यह भी सच है कि बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है, मां का स्वरूप उसकी निगाह में बदलता रहता है। देखें कैसे -

4 साल : मेरी मां कुछ भी कर सकती है।

8 साल : मेरी मां बहुत कुछ जानती है।
12 साल : मां, बहुत सारी चीजें नहीं जानती है।

14 साल : असल में, वह कुछ नहीं जानती है।

16 साल : मां, बहुत पुराने विचारों की है।

18 साल : अरे, वह बूढ़ी और जमाने से काफी पीछे हो गई हैं।

25 साल : हां, शायद वह थोड़ा बहुत जानती है।

35 साल : कोई भी चीज तय करने से पहले मां की राय ले लेते हैं।

45 साल : पता नहीं मां इसके बारे में क्या सोचती होगी।

65 साल : काश, मैं इस बारे में मां से बात कर पाता।


   ध्यान किसलिए करें ?
 ओशो से किसी ने एक दिन पूछा- आखिर हम ध्यान क्यों करें ? ओशो बोले, ठीक पूछा है, क्योंकि हम तो हर बात के लिए पूछेंगे कि किसलिए? कोई कारण होना जरूरी है, कुछ दिखाई पड़े कि धन मिलेगा, यश मिलेगा, गौरव मिलेगा, कुछ मिलेगा, तो फिर हम कुछ कोशिश करें। दरअसल जीवन में हम कोई भी काम तभी करते हैं जब कुछ मिलने को हो। ऐसा कोई काम करने के लिए कोई राजी नहीं होगा जिसमें कहा जाए कि कुछ मिलेगा नहीं और करो। वह कहेगा, फिर मैं पागल हूं क्या? जब कुछ मिलेगा नहीं, तो मैं क्यों करूं? 
लेकिन मैं आपसे निवेदन करता हूं कि जीवन में वे ही क्षण महत्वपूर्ण हैं, जब आप कुछ ऐसा करते हैं जिसमें कुछ भी मिलता नहीं। यह मैं फिर से दोहराता हूं, जीवन में वे ही क्षण महत्वपूर्ण हैं, जब आप कुछ ऐसा करते हैं, जिसमें कुछ मिलता नहीं। जब कुछ मिलने के लिए आप करते हैं, तब हाथ बहुत कम आता है। कुछ बड़ा पाने के लिए कुछ पाने की आकांक्षा नहीं होनी चाहिए। अगर ऐसा हुआ तो बड़े काम में रुकावट आ जाएगी। 
ध्यान क्यों? 
ध्यान किसलिए करते हैं? अगर कोई आपसे पूछे कि आप किसी से प्यार क्यों करते हैं? तो क्या कहेंगे? आप कहेंगे कि प्रेम खुद में आनंद है। जरूरी नहीं कि इसका कोई कारण हो। प्रेम खुद में ही आनंद है। उसके बाहर और कोई कारण नहीं है जिसके लिए प्रेम किया जाए। अगर कोई किसी कारण से प्यार करता हो तो हम फौरन समझ जाएंगे कि गड़बड़ है, यह प्यार सच्चा नहीं है। मैं आपको इसलिए प्यार करता हूं कि आपके पास पैसा है, वह मिल जाएगा। तो फिर प्यार झूठा हो गया। मैं इसलिए प्यार करता हूं कि मैं परेशानी में हूं, अकेला हूं, आप साथी हो जाएंगे। वह प्यार भी झूठा हो गया। वह प्यार नहीं रहा। जहां कोई कारण है, वहां प्यार नहीं रहा, जहां कुछ पाने की इच्छा है, वहां प्यार की कोई गुंजाइश नहीं है। प्यार तो अपने आप में ही पूरा है। ठीक वैसे ही, ध्यान के आगे कुछ पाने को जब हम पूछते हैं- क्या मिलेगा? ऐसा सवाल हमारा लोभ पूछ रहा है। मोक्ष मिलेगा कि नहीं? आत्मा मिलेगी कि नहीं? नहीं, मैं आपसे कहता हूं, कुछ भी नहीं मिलेगा और जहां कुछ भी नहीं मिलता, वहीं सब कुछ मिल जाता है। जिसे हमने कभी खोया नहीं, जिसे हम कभी खो नहीं सकते, जो हमारे भीतर मौजूद है। अगर वह पाना है जो हमारे भीतर पहले से ही है तो कुछ और पाने की इच्छा का कोई मतलब नहीं हो सकता। सब पाने की इच्छा छोड़ कर जब हम मौन, चुप रह जाएंगे, तो उसके दर्शन होंगे जो हमारे भीतर हमेशा मौजूद है। ऐसा सब कुछ पाने के लिए कुछ न करने की अवस्था में आना बहुत जरूरी है। 
दौड़ना छोड़ दो! 
अगर मुझे आपके पास आना हो तो दौड़ना पड़ेगा , चलना पड़ेगा और अगर मुझे मेरे ही पास आना हो तो फिरकैसे दौडूंगा और कैसे चलूंगा ? अगर कोई आदमी कहे कि मैं अपने को ही पाने के लिए दौड़ रहा हूं , तो हम उसेपागल कहेंगे और उसे सलाह देंगे कि दौड़ने में तुम वक्त बर्बाद कर रहे हो। दौड़ने से क्या होगा ? दौड़ते हैं दूसरेतक पहुंचने के लिए , अपने तक पहुंचने के लिए कोई दौड़ना नहीं होता। इसलिए अपने तक पहुंचने के लिए हरतरह की दौड़ छोड़ देनी होती है। क्रिया होती है कुछ पाने के लिए , लेकिन जिसे स्वयं को पाना है उसके लिए कोईक्रिया नहीं होती , सारी क्रिया छोड़ देनी होती है। जो क्रिया छोड़ कर , दौड़ छोड़ कर रुक जाता है , ठहर जाता है, वह खुद को पा लेता है और यह खुद को पा लेना ही सबकुछ पा लेना है। जो इसे खो देता है वह सब पा ले तोभी उसके पाने का कोई मूल्य नहीं। लगातार दौड़ने के बाद एक दिन वह पाएगा कि वह खाली हाथ था और खालीहाथ ही है। अज्ञान की स्थिति में ध्यान के सिवा कोई और मार्ग नहीं है , और ध्यान की अवस्था में जाना अज्ञानीके बस का नहीं है।