अधजल गगरी के लिए..
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वाराणसी (एसएनबी)। गुरु आज थोड़ा लेट आये। अड़ी पर वैसे भी पता नहीं लोग
विलम्ब से आ रहे हैं। चेला थोड़ा पहले ही आ गया था। लगा लिया था। भोला का गोला।
ऊपर से चाय। गुरु ने पहुंचते ही झोला रखा। पप्पू.. एक मसाले वाली। गुरु ई बड़का
कचहरी का कर रही है। चेला खिन्न भाव से बड़बड़ाया। बताईये भला, समाज प्रगति कर रहा है। समलैंगिक बन
रहा है। बीच में ई अडंगेबाजी। आखिर क्या मिला। आपै बताइये कितना कन्ट्रोल हो
जाता। रोजै गोली चलती है। अखबारे में कौनों समाचारै नाही। 6 बच्चों की मां प्रेमी के साथ फुर्र।
प्रेमिका-प्रेमी भागते हुए पकड़ाये। प्रेमिका के लिए नस काट ली। अरे ई सब से तो
पिण्ड छूटता। उसके भाषण का इरादा लम्बा भांप कर गुरु से नहीं रहा गया। चोप्प..।
एक दम से रह गया बउचट का बउचटै। चार दिन एम.पी. साहब के यहां दिल्ली क्या घूम
आया। बौरा गया। प्रगतिशील समाज की मिरगी आने लगी। इसीलिए.. इसीलिये कहता हूं कि
कुछ पढ़ा लिखा कर। पप्पू कुछ चाय बढ़ा देना। कुछ और लोग जुटने लग गये थे। चेला
को मायूस देख उनमें एक उसका पक्षधर बन गया। आखिर झुन्नू चच्चा की लक्ष्किया
फलाने के साथ भाग गयी तो गुरु थू-थू हुई न। न रहेगा, न बजेगी बांसुरी। समलैंगिक समाज में ई
सब का झंझटै कहां रहेगा। आखिरकार गुरु मुखर हुये। यहां यह बताना जरूरी है कि
काशी के समाज में अड़ियों को विशेष दर्जा प्राप्त है। यहां केवल दो समुदाय कुछ
देर के लिए प्रवास करते हैं। एक गुरु-दूसरा चेला। बहस बाद में यहां कठुज्जत का
स्वरूप ले लेती है। गुरु ने कुत्रे की बाह चढ़ायी। आराम से मेज पर टेक कर बैठे।
अरे बुड़बकों, अभी ये
जिस भोला का गोला घोटा है। उनको जानता है। लो.. अब हम शंकरै जी को नहीं जानते।
का गुरु.। हां नहीं जानते। वे त्रिपुरारी हैं। काशी के कण-कण में हैं। शिव हैं।
उन्हें शक्ति कहां से मिलती है? बोलो..? नहीं
जानते ना। फेफरी आ गयी ना मुंह पर। चेला एक बेहयायी भरी हंसी हंसा। गुरु रौ में
थे। पार्वती से शक्ति मिलती है। शिव और शक्ति। समाज का आधार। सृष्टि का आधार।
प्रकृति और पुरुष के मिलन के वे निमित्त हैं। प्रत्येक नारी में शक्ति का अंश
है। उभयलिंगी और संतुलित समाज ही वेद, उपनिषद या दुनिया के सभी ग्रन्थों का
सार है। कुछ पढ़ लिख मत। विधायक जी के पीछे-पीछे घूमा कर। बड़ा ज्ञानी बन
जायेगा। बकलोल कत्तौं का। ई काशी है। यहां गंगा का पानी, कबीर की बानी, नजीर की जबानी बहते हैं। असल में
तुम्हारी गलती नहीं। बुद्धि की मुफलिसी का दौर ही है। बड़की कचहरी इसे दूर करना
चाहती है तो क्या बुरा है। अरे पपुआ चहिया तनी एक दैयां और बनाव। वह भी बहस का
मजा ले रहा था। एक ने गुरु को छेड़ा। आखिर एमन हर्जा का हौ। है ना। बहुत हर्ज
है। ढेर सारे खतरे हैं। आंगन से किलकारी छिन जाने का खतरा, मां का आंचल गुम हो जाने का खतरा।
रक्षाबंधन, तीज
त्यौहार। एक हो तो गिनाऊं। तोनहन के बुद्धिया को क्या हो गया है रे। सब अधजल
गगरी हो गये हैं। पढ़ो लिखो। गुरु ने झोला समेटा। हम भी नमस्कार बंदगी कर रुखसत
हुये। ‘स्नेह’ आम बात
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